गोरखपुर की राजनीति धीरे-धीरे बदल रही है करवट

एनटी न्यूज / विशेष डेस्क

धीरे धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है…

पॉलिटिकल टूरिष्ट रवि किशन का ग्लैमर गोरखपुर में अबतक फीका ही रहा है, जो थोड़ी बहुत उम्मीद जातीय समीकरण पर टिकी थी वो अब पूरी तरह से बदल गई है.  -संदीप पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

बीते 25 अप्रैल को तपती दुपहरी में आजमगढ़ की रैली में दमकते चेहरे के साथ सीएम योगी के कंठ से बीजेपी प्रत्याशी के लिए जोशीले उदगार फूट रहे थे, लेकिन जब आदित्यनाथ शाम को वाराणसी पहुंचे तो खोए-खोए से दिखाई दे रहे थे.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, वाराणसी की गंगा आरती में (फोटोः एएनआई)

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गोरखपुर को लेकर सीएम योगी का आत्मविश्वास डिगा?

अलौकिक गंगा आरती, पार्टी के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी के बावजूद उनकी बॉडी लैंग्वेज सहज नहीं थी. दरअसल दोपहर बाद आई एक खबर ने आदित्यनाथ के गोरखपुर संसदीय सीट को जीतने के आत्मविश्वास को डिगा दिया. खबर थी कि कांग्रेस ने सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता मधुसूदन त्रिपाठी को गोरखपुर लोकसभा से अपना उम्मीदवार बनाया है.

गोरखपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार मधुसूदन त्रिपाठी

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गोरखपुर के इलाके में मधुसूदन त्रिपाठी एक प्रभावशाली नाम हैं. वो यहां के समीकरण को बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं. ये बात आदित्यनाथ बखूबी समझते हैं. लोकसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद आदित्यनाथ पहले से ही परेशान थे और जो तस्वीर अब बनती दिखाई दे रही है वो उन्हें विचलित करने वाली है. जिस उमंग और उत्साह के साथ आदित्यनाथ ने प्रवीण निषाद को बीजेपी में शामिल कराया था उसकी हवा तो तभी निकल गई थी जब प्रवीण को गोरखपुर की बजाए संतकबीरनगर से टिकट दे दिया गया.

गोरखपुर की जनता अपने रहनुमा खोजती है…

बीजेपी के इस कदम से गोरखपुर के निषाद मतदाताओं में ये संदेश गया कि आदित्यनाथ जी ने निषादों को बेवकूफ बनाया है. इसका फायदा उठाते हुए गठबंधन ने रामभुआल निषाद पर दांव लगाया. आदित्यनाथ इस झटके से उबर ही रहे थे कि मधुसूदन त्रिपाठी का आना गोरखपुर की राजनीति का रंग बदलने वाला साबित हुआ. पॉलिटिकल टूरिष्ट रवि किशन का ग्लैमर गोरखपुर में अबतक फीका ही रहा है, जो थोड़ी बहुत उम्मीद जातीय समीकरण पर टिकी थी वो अब पूरी तरह से बदल गई है. गोरखपुर की जनता अपने रहनुमाओं में जिस तेवर को खोजती है वही तेवर मधुसूदन त्रिपाठी की पहचान रही है. मुंबई से सियासी पर्यटक को लाकर आदित्यनाथ अपनी छिनी जा चुकी सीट को वापस पाना चाह रहे थे जो अब दूर की कौड़ी साबित हो रही है. इसे दुष्यंत के शब्दों में समझे तो कुछ ऐसा है.

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फिर धीरे धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है
वातावरण सो रहा था अब आंख मलने लगा है
बातें बहुत हो रही हैं, मेरे तुम्हारे विषय में
जो रास्ते में खड़ा था पर्वत पिघलने लगा है.

(ये वरिष्ठ पत्रकार संदीप पांडेय का लेख है इस किसी हिस्से का न्यूज टैंक्स जिम्मेदार नहीं है.)