स्वास्थ्य सुविधाओं की सुध लेती सरकार

एनटी न्यूज / लखनऊ डेस्क

स्वागतयोग्य है कि मोदी सरकार ने वर्ष 2025 तक स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च को बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.5 प्रतिशत करने की प्रतिबद्धता जाहिर की है। इसकी उद्घोषणा स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विज्ञान भवन में आयोजित ‘नारी शक्ति, युवा शक्ति का कल्याण’ विषय पर ‘पार्टनर फोरम’ सम्मेलन को संबोधित करते हुए की।

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गौरतलब है कि अभी तक स्वास्थ्य सेवाओं पर देश का खर्च सकल घरेलू उत्पाद का महज 1.15 प्रतिशत ही है। किंतु अच्छी बात यह है सरकार देश में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर संवेदनशील है और उसी का परिणाम है कि वृहद टीकाकरण कार्यक्रम के अंतर्गत पिछले तीन वर्षों में मिशन इंद्रधनुष के तहत देश में 3.28 करोड़ बच्चों एवं 84 लाख गर्भवती महिलाओं तक पहुंच बनी है। अब चूंकि स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ेगा ऐसे में उम्मीद किया जाना चाहिए कि भारत को स्वस्थ बनाने में कामयाबी मिलेगी। किसी से छिपा नहीं है कि स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में भारत अपने पड़ोसी देशों मसलन चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से भी पीछे है और बेहतर इलाज न मिलने से यहां प्रति एक लाख लोगों में 122 लोग मौत के मुंह में जाते हैं। जबकि पड़ोसी देश चीन में यह आंकड़ा 46 है। वहीं श्रीलंका में 51, बांग्लादेश में 57, नेपाल में 93 और पाकिस्तान में 119 है। गौर करें तो खराब इलाज से मृतकों में भारत ब्रिक्स देशों में सबसे आगे है। आंकड़ों पर गौर करें तो देश में सालाना होने वाली कुल मौतों में से 6 प्रतिशत लोगों की मौत कैंसर से होती है। यह दुनिया भर में कैंसर से होने वाली कुल मौतों का 8 प्रतिशत है। कैंसर की वजह से देश में हर रोज 1300 मौतें होती हैं। कैंसर की तरह मधुमेह भी भारत के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। भारत में 6 करोड़ से अधिक लोग मधुमेह से पीडित हैं। हर वर्ष तकरीबन 15 लाख लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। इसी तरह भारत की आधी से अधिक आबादी श्वास संबंधी रोगों और फेफड़ों से जुड़ी शिकायतों से ग्रस्त है।

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प्रतिदिन तकरीबन साढ़े तीन करोड़ लोग डाॅक्टरों के पास स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों के निदान के लिए जाते हैं। इस तरह भारत विश्व की सर्वाधिक बीमारियों का बोझ उठाने वाले देशों में शुमार हो चुका है। आंकड़ों के मुताबिक विश्व की कुल 7.3 अरब की जनसंख्या के मुकाबले भारत की 1.2 अरब की आबादी में सालाना विश्व भर में होने वाली मौतों का 18 प्रतिशत मौतें भारत में होती है। जनवरी 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट से उद्घाटित हो चुका है कि विश्व में असंक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की तादात लगातार बढ़ रही है और उसमें भारत की स्थिति बेहद नाजुक है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हर वर्ष 1.6 करोड़ लोग कैंसर, मधुमेह और हृदयघात जैसे असंक्रामक रोगों की वजह से मर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में असंक्रामक रोगों से 30 से 70 साल के बीच मरने वाले लोगों की आशंका 26.1 से बढ़कर 26.2 प्रतिशत हो गया है। तुलनात्मक रुप से यह आंकड़ा दक्षिण एशिया और अफ्रीका के कुछ देशों की तुलना में बेहद खराब है। रिपोर्ट के मुताबिक पी-5 देशों (चीन, फ्रांस, रुस, ब्रिटेन और अमेरिका) में केवल रुस की ही स्थिति (29.2 प्रतिशत के साथ) भारत से अधिक खराब है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माना है कि असंक्रामक बीमारियों में कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और सांस लेने में परेशानी संबंधी प्रमुख चार बीमारियां हैं। असंक्रामक रोगों की वजह से भारत ही नहीं विश्व की एक तिहाई आबादी भी मुश्किल में है। उसका कारण यह है कि इन असंक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए अभी तक कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। अच्छी बात यह है कि इस दिशा में पार्टनरशिप टू फाइट क्राॅनिक डिजीज (पीएसीडी) ने हाल ही में संकल्प दिशा स्वस्थ भारत की नाम से एक राष्ट्रीय रुपरेखा तैयार की है। इसका उद्देश्य देश में 2025 तक स्वस्थ भारत के संकल्प को हासिल करने में सहयोग देना है। चूंकि भारत में असंक्रामक रोगों से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है लिहाजा ऐसे में इस ब्लू प्रिंट से राज्यों को स्वास्थ्य संबंधी मामलों को प्राथमिकता देने में मदद मिलेगी। अगर इसे जमीनी शक्ल दिया जाता है तो भारत में हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और मस्तिष्क आघात से मरने वाले लोगों की संख्या कम होगी।

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हालांकि भारत सरकार असंक्रामक रोगों से निपटने के लिए भारी धनराशि खर्च की जा रही है लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिल रहे है। चिकित्सकों का कहना है कि अगर इन बीमारियों पर शीध्र ही नियंत्रण स्थापित नहीं किया गया तो यह बीमारी राष्ट्रीय आपदा का रुप ग्रहण कर सकती है और इससे निपटना आसान नहीं रह जाएगा। सरकार की कोशिश यह है कि 30 वर्ष से ज्यादा उम्र के व्यक्तियों में गैर संचारी रोगों को लेकर ज्यादा से ज्यादा जागरुकता पैदा किया जाय और व्यापक स्तर पर उनका शारीरिक परीक्षण कराया जाए। निःसंदेह यह एक सार्थक कहद होगा। लेकिन जानकर हैरानी होगी कि गत वर्ष सरकार ने 30 वर्ष से अधिक सात करोड़ लोगों के परीक्षण की योजना बनायी लेकिन अभी तक उस दिशा में दो कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सका है। अगर इस योजना को आकार दिया जाए तो देश की एक बड़ी आबादी को स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करने में मदद मिलेगी।

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भारत के महापंजीयक द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि देश के 35 से 64 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों में 42 फीसदी मौत की वजह असंक्रामक रोग है। अगर इन रोगों के लक्षणों को समझ लिया जाय तो इस पर नियंत्रण पाने में आसानी होगी। ऐसा माना जाता है कि असंक्रामक रोगों का जितना जल्दी इलाज शुरु होता है वह उतना ही लाभकारी होता है। सरकार को चाहिए कि वह असंक्रामक रोगों की दवाइयों की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण लगाए। सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक सुधार के लिए शहरों के साथ-साथ गांवों पर ज्यादा फोकस बढ़ाना चाहिए। इसलिए कि असंक्रामक रोगों से मरने वालों की ज्यादा तादाद गांवों में है। गांवो में स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढ़ांचा पूरी तरह चरमराया हुआ है। गांवों में स्थापित अस्पताल जर्जर हैं। न तो वहां डाॅक्टर हैं और न ही दवाइयां। ऐसी स्थिति में भला असंक्रामक रोगों से कैसे निपटा जा सकता है।

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विडंबना यह है कि गांव के लोगों को तब तक असंक्रामक रोगों के बारे में जानकारी नहीं होती जब तक कि वह पूरी तरह उसके चपेट में नहीं आ जाते हैं। जब तक उन्हें अपनी बीमारियों के बारे में जानकारी मिलती है तब तक बीमारियां गंभीर रुप धारण कर चुकी होती हैं। चूंकि गांवों में इन रोगों के इलाज की बेहतर सुविधा नहीं है लिहाजा उन्हें शहर की ओर रुख करना पड़ता है। उचित होगा कि सरकार गांवों में बेहतर और सस्ता इलाज की सुविधा उपलब्ध कराए ताकि लोगों को असामयिक मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सके। निःसंदेह पिछले कुछ वर्षों में कैंसर जैसी घातक बीमारियों के उपचार में नई तकनीक और दवाइयां ईजाद हुई हैं लेकिन ये इतनी अधिक महंगी हैं कि आमलोगों की पहुंच से बाहर हैं। अच्छी बात है कि भारत सरकार महंगी जीवनरक्षक दवाईयों की कीमत कम करने का प्रयास कर रही है ताकि गंभीर बीमारियों से त्रस्त आम आदमी भी इलाज करा सके।

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यहां ध्यान देना होगा कि नशाखोरी विशेष रुप से तंबाकू और शराब के कारण भी बीमारियां बढ़ रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि तंबाकू के सेवन से प्रतिवर्ष 60 लाख लोगों की मौत होती है और तरह-तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। स्वीडिश नेशनल हेल्थ एंड वेल्फेयर बोर्ड और ब्लूमबर्ग फिलांथ्रोपिज की रिसर्च से भी उद्घाटित हो चुका है कि धुम्रपान से हर वर्ष 6 लाख से अधिक लोगों की मौत होती है। मरने वालों में तकरीबन 2 लाख से अधिक बच्चे और युवा होते हैं। अब शराब पर भी रोक लगाने की मांग तेज हो रही है। यह तथ्य है कि हर वर्ष हजारों लोगों की मौत शराब पीने और उससे उत्पन होने वाली बीमारियों की वजह से होती है।

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आज जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं गंभीर बीमारियों से निपटने के लिए समन्वित रुप से असरकारक कार्यक्रम तैयार करें। इसलिए कि गंभीर बीमारियों का बढ़ता दायरा न सिर्फ जिंदगी को मौत में बदल रहा है बल्कि सामाजिक व आर्थिक विकास कार्य में भी विध्न डाल रहा है। अच्छी बात यह है कि भारत सरकार ने देश के लोगों को निरोग बनाने हेतु आयुष्मान भारत योजना का शुभारंभ की है। लेकिन इस योजना को अमलीजामा पहनाना किसी चुनौती से कम नहीं है।

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ये विचार ‘अरविंद जयतिलक’ (समसामयिक मुद्दों पर लेखक) के हैं. (आप भी अपने विचार और लेख भेज सकते हैं, हमारी ई-मेल आईडी है-  newstankshindi@gmail.com)