एनकाउंटर में मानवाधिकार की बात ठीक है, लेकिन पुलिस के दर्द को भी तो देखिए

एनटी//नितिन भदौरिया//लखनऊ-

एनकांउटर अपराधियों का होता है अपराधी समाज को कितनी छति पहुचाते हैं यह किसी से छुपा नही है। हम मानवाधिकार की बात करते हैं , सही बात है होनी भी चाहिए। लेकिन हम उस पुलिस का दर्द भी देखें जो मुठभेड़ में शहीद हो गया या घायल होगया। उसमे से ऐसे कई ऐसे होते हैं जो अपने घर के अकेले चिराग होते हैं, असमय उसका जाना उस पीड़ा को उसकी माँ , पत्नी और बच्चो के अलावा कोई और नही समझ सकता। मुठभेड़ में जब कोई पुलिस वाला गंभीर रूप से घायल होता है , जिसने कोई अपना एक अंग खो दिया, तो उसका जीवन कैसे गुजरता, जरूर एक बार उसके घर जाइये। सारा सच सामने आ जायेगा। देखिये कोई एनकाउंटर को एक आईपीएस ने अपने शब्दों में बयां किया है।

 

एनकाउंटर सिर्फ एक शब्द नहीं –

यह शब्द सिर्फ शब्द नही बल्कि हर उस वर्दीधारी की ज़िंदगी का एक अध्याय है जिसने किसी वख्त बदमाशों की गोलियों का सामना किया है यह फिक्र किये बिना कि घने अंधेरे में चली वो गोली किसके लहू से खुद को रंग के निकलेगी,यह गोली उसके जिस्म को छलनी कर देगी तो क्या होगा।वो मर्द यह नहीं सोचता कि क्या इस गोली के उसके साथ युद्ध के बाद वो अपने पैर पर खड़ा हो पाएगा, क्या उसका परिवार फिर से उसको मिल पाएगा, क्या यह दिल इसके अगले पल धड़केगा,क्या यह नज़र फिर किसी अपने को देख पाएगी।यह कुछ पलों के खेल होता है जो कई बार आखरी खेल बन जाता है।

सब कुछ दांव पे लगा कर अपना फर्ज निभाते है-

चलती गोलियों के बीच जान बूझ कर जाने के लिए एक जिगर चाहिए ऐसे हालात को झेलने को,एक जनून चाहिए सब कुछ दांव पे लगा कर अपना फर्ज निभाने के लिए,एक रट चाहिए जुर्म के खिलाफ लड़ने की।
यह मौका हर किसी को ज़िन्दगी में नहीं मिल पाता लेकिन जिन्हें मिलता है वो बहुत नसीब से मिलता है।कोई साथी इसी जनून को जीते हुए गुज़र गया।कोई ज़िन्दगी भर के लिए अपना हाथ कोई पैर कुछ और खो बैठा।कुछ ऐसी यादों के साथ जी रहे जो कभी ऐसी याद नहीं चाहते थे। जिसके साथ लड़े उनसे कोई अपना झगड़ा नही था लेकिन धुन थी कि अपने रहते वो किसी को किसी की ज़िंदगी, किसी की आबरू पे हाथ नहीं डालने देंगे।

उनकी क़ुरबानी को झुठलाने की कोशिश की जाती है-

जो शहीद हुए उनके दर्द को करीब से देखने वाले भी दिन ब दिन कम होते गए।कभी किसी को उनके अधिकारों की बात करते नही देखा जो उन बेरहमों के हाथों मारे गए।जो बिना दोष कई लोगों को अपनो से दूर कर गया,जो किसी की मेहनत की सालों की कमाई पल में उसके बच्चे को बंदूक की नोक पर रख लूट ले गया और साथ ही घर की आबरू भी न छोड़ी। ऐसे घिनोने काम वाले के लिए अब रोने वाले और लड़ने वाले तो कई आ गए लेकिन जब वो औरों को रुला रहा था ।

तब इन्होंने कुछ नहीं बोला।एक दिन जी के देखो उनके साथ जिन्होंने अपने बेटे को खोया,अपने पति को खोया,अपने बाप को खोया तब बात करना उनके अधिकारों की।खलता है साहब बहुत खलता है उनका जाना जो इस लड़ाई में मेरे साथी थे ,और भी खलता है जब उनकी क़ुरबानी को झुठलाने की कोशिश की जाती है,जब उन के सर में लगी गोली को किसी गंदी नियत से कोई साज़िश कह दिया जाता है।

इज़्ज़त करो उसकी जिसने तुम्हारे लिए खुद को मिटा दिया-

शरीर पे एक खरोंच न सहने वालो उसका सोचो जो अपने अंगूठा व अपना हाथ खो बैठा और उसका जो जान गंवा बैठे।वो शायद तुम्हारे लिए लड़ रहा था कि कोई तुम्हे कभी राह चलते मार न जाए,शायद तुम्हारे बच्चों के लिए लड़ रहा था की कोई किसी लालच के लिए उसका अपहरण न कर ले वो शायद इस लिए लड़ रहा था कि तुम्हारी बहन तुम्हारी पत्नी इज़्ज़त से जी सके।इसलिए लड़ा था वो आज जिसको तुमने झूठ बता दिया।इज़्ज़त करो उसकी जो तुमहारे लिए खुद की खुदी मिटा गया।सम्मान करो उसका जो खुद न जिया पर कईओं के लाल बचा गया।
खैर जिन में जज़्बा है बुराई से लड़ने का वो हमेशा लड़ते रहेंगे क्यों कि होंसला विरासत में मिलता है ,खून में मिलता है किसी बाज़ारों में नहीं।खाकी है ये किसी भी वक़्त सच के लिए शान से खाक में मिलने को तैयार ।

आईपीएस डॉ अजयपाल शर्मा की फ़ेसबुक वाल स

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